रामकृष्ण परमहंस जयंती

रामकृष्ण परमहंस जयंती || ramkrishna pramhansh jayanti hindi mai || now gyan

ramkrishna pramhansh jayanti in hindi: रामकृष्ण परमहंस जयंती भारत में 25 फरवरी को मनाई जाती है। रामकृष्ण भारत महान संतों में से एक थे। जिन्हें आध्यात्मिक गुरु और विचारक के नाम से भी जाना जाता था। परमहंस जी ने सभी धर्मों की एकता पर जोर दिया तथा राम कृष्ण जी को बचपन से ही विश्वास था की, उन्हें ईश्वर के दर्शन अवश्य होंगे।

रामकृष्ण परमहंस जयंती की तारीख :-

S.No.जयंती || jayantiदिन || day
1.रामकृष्ण परमहंस जयंती 202125 फरवरी 2021
2.रामकृष्ण परमहंस जयंती 202225 फरवरी 2022
3.रामकृष्ण परमहंस जयंती 202325 फरवरी 2023
4.रामकृष्ण परमहंस जयंती 202425 फरवरी 2024
5.रामकृष्ण परमहंस जयंती 202525 फरवरी 2025
रामकृष्ण-परमहंस-जयंती-कब-है?

रामकृष्ण परमहंस का जीवन परिचय :-

रामकृष्ण परमहंस महान संत तथा समाज सुधारक थे। उनमें बचपन से ही ईश्वर प्राप्ति की इच्छा जागृत हो उठी थी। तत्पश्चात उन्होंने कठिन परिश्रम और तपस्या की बात ईश्वर से ज्ञान प्राप्ति की।

जन्म: रामकृष्ण परमहंस :-

रामकृष्ण परमहंस जी का जन्म 18 फरवरी 1836 को पश्चिम बंगाल के कामारपुकुर गांव में हुआ।

माता-पिता: रामकृष्ण परमहंस :-

रामकृष्ण परमहंस जी के पिता का नाम खुदीराम तथा इनकी माता का नाम चंद्रमणि देवी था। कथाओं के अनुसार कहा जाता है, कि एक बार राम कृष्ण परमहंस जी के पिता के सपनों में आकर भगवान गदाधर ने कहा कि वह स्वयं उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे।

पत्नी:रामकृष्ण परमहंस :-

रामकृष्ण परमहंस जी की पत्नी का नाम शारदा मणि मुखोपाध्याय था। रामकृष्ण परमहंस का विवाह 23 वर्ष की उम्र में संपन्न हुआ।

जन्म18 फरवरी 1836
जन्म स्थलपश्चिम बंगाल
माता का नामश्रीमती चंद्रमणि देवी
पिता का नामश्री खुदीराम
पत्नी का नामश्रीमती शारदा मणि मुखोपाध्याय
मृत्यु16 अगस्त 1886
रामकृष्ण परमहंस की जीवनी

स्वामी रामकृष्ण परमहंस का बचपन:-

परमहंस जी बचपन से ही न्रम स्वभाव के थे। कहा जाता है कि उनकी वाणी बहुत ही मधुर तथा मन को मोहने वाली थी। इसी कारण पूरा गांव रामकृष्ण स्वामी जी को से प्रसन्न रहता था और उन्हें अपने घर ले जाकर भोजन कराते थे।

रामकृष्ण परमहंस जी को कृष्ण चरित्र सुनने तथा लीला करने में बहुत आनंद आता था। 16 वर्ष की उम्र में रामकृष्ण परमहंस को पढ़ने के लिए पाठशाला भेजा गया। जहां उनका मन पढ़ाई लिखाई में बिल्कुल भी नहीं लगता था।

संस्कृत पाठशाला में उन्हें समझ नहीं आता था। पंडितों के वाद-विवाद सुनकर घबरा जाते थे। उन्होंने अपने भाई से 1 दिन स्पष्ट बोल दिया कि भाई मैं पढ़ लिख कर क्या करूंगा। पढ़ने लिखने का उद्देश्य तो केवल धन कमाना ही है। मैं पढ़ना लिखना नहीं चाहता मैं तो वह देखना चाहता हूं। जिससे मुझे ईश्वर के चरणों में स्थान मिल सके और उन्होंने पढ़ना लिखना छोड़ दिया। तत्पश्चात ईश्वर की तलाश में इधर उधर चले गए ।

रामकृष्ण परमहंस के प्रमुख प्रवचन || raamakrshn paramahans ke pramukh pravachan:-

” भगवान हर जगह है और कण-कण में है लेकिन वह एक आदमी से ही सबसे अधिक प्रकट होते हैं इस स्थिति में भगवान के रूप में आदमी की सेवा ही भगवान की सबसे अच्छी पूजा है “

स्वामी रामकृष्ण परमहंस

” भगवान सभी पुरुषों में है लेकिन सभी पुरुषों में भगवान नहीं है इसलिए हम पीड़ित है “

स्वामी रामकृष्ण परमहंस

” भगवान तो सबके मन में है लेकिन सबका मन भगवान में नहीं है “

स्वामी रामकृष्ण परमहंस

रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद :-

रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद जी की पहली मुलाकात एक मित्र के घर में हुई थी। वहीं से गुरु रामकृष्ण और शिष्य विवेकानंद में आकर्षण का अध्याय शुरू हुआ था। कहते हैं- “कि जब घर के काम के कारण स्वामी विवेकानंद जी रामकृष्ण परमहंस से मिलने न जा पाते तो रामकृष्ण व्याकुल हो जाते थे।” इस प्रकार दोनों के बीच गुरु शिष्य का मधुर संबंध था।

स्वामी विवेकानंद पर रामकृष्ण परमहंस का प्रभाव :-

विवेकानंद जी रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे। स्वामी विवेकानंद रामकृष्ण परमहंस से प्रश्न पूछा करते थे और रामकृष्ण जी उन्हें उनके प्रश्नों के उत्तर उन्हीं के बुद्धि बल के अनुसार देते थे। एक बार स्वामी विवेकानंद जी ने गुरु परमहंस जी से प्रश्न पूछा कि: अच्छे लोग हमेशा दुखी क्यों रहते हैं?

तब राम कृष्ण जी ने जवाब दिया कि हीरे को चमकने के लिए रगड़ना पड़ता है। तब जाकर वह चमकता है तथा सोने को शुद्ध करने के लिए आग मै तपना ही पड़ता है। इसी प्रकार सच्चे लोग दुख नहीं बल्कि परीक्षाओं से गुजरते हैं। तथा इस अनुभव से मुक्त जीवन बेहतर होता जाता है। बेकार नहीं होता विवेकानंद की बात समझ गए थे। ऐसे ही बहुत से प्रश्न रोजाना विवेकानंद रामकृष्ण थे। दोनों के बीच संबंध और गहरा होता जा रहा था।

रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु :-

रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु 16 अगस्त 1886 को हुई। कहा जाता है- कि रामकृष्ण परमहंस जी के गले में कैंसर था। जिसके कारण उनकी मृत्यु कोसीपुर के बाग़ घर में हुई।

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