मानव अधिकार दिवस पर निबंध

मानव अधिकार दिवस पर निबंध | essay on human rights day in hindi | now gyan

हेलो दोस्तों !!  स्वागत है, आपका आपके ब्लॉक  NOW GYAN में, इस पोस्ट में मैं आपको मानव अधिकार  दिवस के ऊपर एक निबंध बताऊंगा। इस निबंध का प्रयोग आप अपनी परीक्षा तथा अन्य प्रतियोगिताओं में कर सकते हैं ।

प्रस्तावना:- 

मानव के रूप में मनुष्य के क्या अधिकार हैं, और किस सीमा तक कि किसी रूप में उनकी पूर्ति शासन की ओर से हो। इस संबंध में मानव सभ्यता के प्रारंभ से ही विवाद चला आ रहा है। सामान्य मानव के मौलिक अधिकारों में जीवन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार , जीविका का अधिकार, वैचारिक समानता का अधिकार, स्वतंत्र रूप से धार्मिक विश्वास अधिकार, आदि पर चर्चा की जाती है अधिकार है।

मानव अधिकार दिवस पर निबंध
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मानव अधिकार दिवस का इतिहास :-

मानव अधिकार के प्रसंग में सर्वाधिक प्रसिद्ध अभिलेख के रूप में हम 1215 ईस्वी के इंग्लैंड के मैग्नाकार्टा अभिलेख सन 1628 ईसवी के अधिकार याचिका पत्र 1679 ईस्वी की बंदी प्रत्यक्षीकरण अधिनियम सन 1689 ईसवी के अधिकार पत्र सन 1789 ईसवी में फ्रांस की प्रसिद्ध मानव अधिकार घोषणा पत्र सन 1769 ईस्वी की अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा को ले सकते हैं।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानव अधिकार की बात सन् 1945 ईस्वी में संयुक्त राष्ट्र में उठी। सन 1946 ईस्वी में “मानव अधिकार आयोग” का गठन किया गया। आयोग की सिफारिशों के आधार पर 10 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र ने एक घोषणापत्र की जारी किया। इसे अब मानव अधिकारों का घोषणा पत्र के नाम से जाना जाता है। सन 1950 ईस्वी में संयुक्त राष्ट्र ने प्रतिवर्ष 10 दिसंबर के दिन को मानव अधिकार दिवस के रूप में मनाने का घोषणा की ।

मानव अधिकार दिवस की आवश्यकता :-

लोकतंत्र की अवधारणा मानव अधिकारों को सुनिश्चित करने की बढ़ती हुई आवश्यकता के साथ स्पष्ट रूप से जुड़ी हुई है। इसके अभाव में ना तो कोई व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकता है। और ना ही सुखी जीवन व्यतीत कर सकता है।

मानव अधिकारों की सुरक्षा के अभाव में जनतंत्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। एक तानाशाही के अंतर्गत मानव की मूल अधिकारों तथा स्वतंत्र का लोप हो जाता है। सैनिक एवं प्रतिक्रियावादी शासकों द्वारा मानवीय अधिकारों के दुरुपयोग नहीं जनसाधारण में एक नवीन जागृति उत्पन्न की जहां कहीं भी मानव अधिकारों को नकारा गया है।

 वही अन्याय क्रूरता तथा अत्याचार का तांडव देखा गया है। मानवता बुरी तरह से अपमानित हुई है।  और जनमानस की दशा निरंतर बिगड़ती गई है।

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मानव अधिकार दिवस के उद्देश्य :- 

संयुक्त राष्ट्र की विधान के अनुच्छेद में कहा गया है, कि उसका एक उद्देश्य आर्थिक सामाजिक सांस्कृतिक तथा मानवीय रूप अंतरराष्ट्रीय समस्या के समाधान तथा जाति,भाषा,धर्म के सब प्रकार के भेदभाव के बिना मानव अधिकारों मौलिक अधिकारों तथा स्वतंत्रताओं की संवर्धन व प्रोत्साहन के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की प्राप्ति करना होगा।

इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक सामाजिक परिषद ने सन 1946 ईस्वी में मानव अधिकार आयोग की स्थापना की थी। आयोग की संस्तुति के आधार पर संयुक्त राष्ट्र ने जो मानव अधिकार घोषणा पत्र जारी किया।  और उसमें जिन मानव अधिकारों की चर्चा की गई।  उन्हें मान्यता प्रदान करने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र ने सन 1965 ईस्वी सन् 1976 तथा 1985 में तीन विभिन्न संविदा पत्र जारी किए विश्व में सर्वत्र इस दृष्टि से सजगता दिखाई देती है ।

कि संपूर्ण मानवता को अधिकार सुलभ होने चाहिए लेकिन व्यवहार में स्थिति संतोषजनक नहीं है। आज विश्व के कई देशों में मानव अधिकारों का हनन किया जा रहा है।

भारत में मानव अधिकार दिवस :-

संयुक्त राष्ट्र की घोषणा पत्र के अनुरूप ही भारत ने भी राष्ट्रीय स्तर पर मानव अधिकार आयोग की नियुक्ति की है।तथा इसके साथ-साथ राज्यों में भी मानव अधिकार आयोग की स्थापना की है। जिससे कि मानव अधिकारों का उल्लंघन ना हो सके इस दृष्टि से भारत में गणतंत्र वर्ष में संसद द्वारा मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 पारित किया गया।

इसका उद्देश्य मानव अधिकार संरक्षण के लिए तथा उसे संबंध कर उसे आनुषंगिक मामलों के लिए राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग राज्य मानव अधिकार आयोग मानवाधिकार न्यायालय के गठन हेतु , विविध प्रकार के प्रावधान करना है।

इस अधिनियम की धारा 2 में मानव अधिकार की परिभाषा दी गई है। मानव अधिकारों में अंतर्राष्ट्रीय योग एवं भारतीय संविधान द्वारा स्वतंत्रता से संबंध अधिकारों को सम्मानित किया गया है। इसका मूल मानव जीवन और उसकी गरिमा को सुरक्षा प्रदान करना है।

मानव अधिकार दिवस की वास्तविक स्थिति :- 

इसमें संदेह नहीं है, कि मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा संयुक्त राष्ट्र की एक उल्लेखनीय उपलब्धि है।  परंतु जहां तक मानव अधिकारों की सुरक्षा का प्रश्न है।  यह घोषणा कोरा आदर्शवादी सिद्ध हुई है, इसको व्यवहार में लाने में अब भी पर्याप्त कठिनाइयां बनी हुई है।

मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा पत्र पर अनेक राष्ट्रों ने हस्ताक्षर कर दिए हैं। परंतु उनका व्यावहारिक बनाने के लिए अभी तक उनका अनुमोदित नहीं किया उसका अनुमोदन भी कर दिया है।उन्हें भी अधिकारों को लागू करने के लिए बाध्य करने का कोई प्रावधान नहीं है ।


   वास्तव में यह अधिकार तो मात्र नैतिकता के मानदंड हैं। जिन्हें स्वीकार करना पूर्ण रूप से राज्य की इच्छा पर निर्भर करता है।  यदि कोई राज्य इस घोषणापत्र की व्यवस्था की विपरीत आचरण करता है। तो उसे इन अधिकारों को अपने नागरिकों को प्रदान करने के लिए किसी भी रूप में हस्तक्षेप करके बाध्य नहीं किया जा सकता। यह व्यवस्था तो अवश्य है, कि यदि कोई राज्य मानव अधिकारों का भीषण मन करता है। तो उसकी महासभा में भर्त्सना की जा सकती है।  और उसके विरुद्ध आर्थिक व राजनीतिक बहिष्कार की नीति अपनाई जा सकती है।

परंतु यह व्यवस्था भी अधिक कारगर सिद्ध नहीं हुई है।  विश्व के विकसित देश भी अपने यहां मानवीय अधिकारों को सुरक्षा देने में पढ़ रहे हैं। विदेशों की तो बात ही क्या है। आज भी कुछ विकसित देश ऐसे हैं। जहां की सरकारों अपने नागरिकों को इन अधिकारों से वंचित रखे हुए हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में कहा गया है, कि विश्व में 120 देशों में मानवीय अधिकारों का हनन हो रहा है।

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उपसंहार :- 

भारत हमेशा से मानव अधिकारों के प्रति सजग रहा है।  वह विश्व मंच पर मानव अधिकारों का समर्थन करता रहा है। मानव अधिकारों का हनन तथा उसका उल्लंघन विश्व के समक्ष एक गंभीर समस्या बनी हुई है। यह आधुनिक सभ्यता पर लगा एक दाग है। यदि अधिकारों के उल्लंघन तू नहीं रोका गया तो निश्चित ही यह मानवता के विनाश का कारण बनेगा ।

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